रविवार, 11 फ़रवरी 2018

ये उदासी मेरे दिल की नहीं जाने वाली.

ग़ज़ल

ये उदासी मेरे दिल की नहीं जाने वाली.
हाथ अब ज़िंदगी वापस नहीं आने वाली.

कैसे जीते हो अकेले भला तन्हाई में,
बात मत पूछो कोई मुझसे रुलाने वाली.

लाश अपनी को मैं काँधे पे लिये फिरता हूँ,
आग ढूँढ़े हूँ कोई उसको जलाने वाली.

तल्ख़ियां ही मेरे हिस्से में मुझे दीं उसने
बात में कैसे कहूँ तुमको सुहाने वाली.

हो ज़मी सारी ये काग़ज़ हो समन्दर स्याही,
दास्तां दिल की नहीं फिर भी समाने वाली.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.11-02-2018
         
                                                                                                                                               

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

अब पकोड़ों को बनाओ लोगो.


ग़ज़ल

अब पकोड़ों को बनाओ लोगो.
खुद भी खाओ व खिलाओ लोगो.

हाथ धर सर पे यूँ रोते क्यों हो,
और सर हमको बिठाओ लोगो.

सीख लो चाय बनाने का हुनर,
बाद में सबको  बनाओ लोगो.

आम चाहे हो बबूलों से तुम ,
    होश अब यूँ ना गंवाओ लोगो.

तुम अगर रोशनी के हामी हो,
मिल अँधेरों को भगाओ लोगो.

भेड़िये दूर तलक भागेंगे,
अब मशालों को जलाओ लोगो.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 03-02-2018

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

और क्या आग लगाओगे बताओ तो सही.

ग़ज़ल

और क्या आग लगाओगे बताओ तो सही.
फिर मुझे छोड़ के जाओगे बताओ तो सही.

आँसू बनकर कि जो उमड़ा मैं कभी आँखों में,
हँस के पलकों पे छिपाओगे बताओ तो सही.

हमसे बिछुड़े तो हमसा ना दुबारा पाया,
दास्तां अपनी सुनाओगे बताओ तो सही.

तुम सा प्यारा नहीं दुनियां में हमारा कोई,
झूट सर की कसम खाओगे बताओ तो सही.

आईना आप भी भूले से तो देखो साहब,
ऐब मेरे ही गिनाओगे बताओ तो सही.

घेर लेंगे जो अँधेरे तुम्हें तन्हाई के,
मेरी ग़ज़लों को क्या गाओगे बताओ तो सही.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.01-02-2018

सोमवार, 29 जनवरी 2018

अश्कों को इन आँखों से बर्बाद किया जाये.

ग़ज़ल
अश्कों को इन आँखों से बर्बाद किया जाये.
उस बेवफ़ा को फिर से अब याद किया जाये.

टूटे जो मकां कोई आबाद करें उसको,
टूटा हुआ ये दिल ना आबाद किया जाये.

सूरत ही नहीं मिलती अब तेरी किसी से भी,
फिर  कैसे कहो दूजा इर्शाद किया जाये.

हम लाख करें कोशिश उस शै को भुलाने की,
पर मोम सा ये दिल ना फौलाद किया जाये.

उसने तो बिछुड़ते दम रो रो के कहा मुझ से,
क़ैदी तू उमर भर ना आज़ाद किया जाये.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.29-01-2018



रविवार, 28 जनवरी 2018

मैं जहां भी गया यादें भी तेरी साथ रहीं,

ग़ज़ल

दिल का ये ज़ख़्म है गहरा नहीं भरने वाला.
 तेरा शैदाई ये ज़ल्दी नहीं मरने  वाला.


मैं जहां भी गया यादें भी तेरी साथ रहीं,
ये नशा अब न मुहब्बत का उतरने वाला.


पास आये तो वो मौजों की रवानी समझे,
 दूर ही दूर समन्दर से गुज़रने वाला .


तू परेशान बहुत है तू परेशान न हो,
वो संग दिल है नहीं मोम पिघलने वाला.


है अभी वक्त तू , दो चार ही बातें कर ले,
ये मुसाफ़िर  नहीं ज़्यादा है ठहरने वाला.


आँधियां ले गयी किस ओर उड़ाकर उसको,
शान से बैठा था शाखों पे बिखरने वाला.



डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 28-01-2018

बुधवार, 10 जनवरी 2018

मेरी तन्हाईयाँ लगता है मुझको मार डालेंगी.

ग़ज़ल

तेरी यादें कहां तक अब भला मुझको संभालेंगी.
मेरी तन्हाईयाँ लगता है मुझको मार डालेंगी.

तुम्हें शिकवे बहुत थे ये कि ज़्यादा बोलता हूँ मैं,
मेरी ख़ामोशियां ही अब मेरा ये दम निकालेंगी.

कहां किस्मत थी मैं सोऊं तेरे ज़ानूं पे सर रखकर,
समन्दर की ये ख़ाराशें मुझे ऐसे लुभालेंगी.

उठाये तेरी महफ़िल से कहां लोगों में जुर्रत थी,
पता क्या था तेरी गुस्ताख़ियां पगड़ी उछालेंगी.

सिर्फ़ ख़ाराश ही मुझमें नहीं रहते है गौहर भी,
  हुआ रुख़सत जो दुनियां से तो फिर सदियां खंगालेंगी.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.10-01-2018




मंगलवार, 2 जनवरी 2018

तेरी गली तो क्या, तेरा शहर भी छोड़ दिया .

ग़ज़ल

कभी जो नाता था तुझसेवो कब का तोड़ दिया.
तेरी गली तो क्यातेरा शहर भी छोड़ दिया .

क़फ़स में सांस भी लेने में दिक्कतें थी बहुत,
अना ने हमको भी अंदर से फिर झिंझोड़ दिया.

 दिखाया अक्श जो उसकोतो ये सज़ा दी मुझे,
जुनूं में हाथ से आईनाउसने फोड़ दिया.

परों को काटवो पंछी की ज़ुबा सिलता था,
उड़ान भरने पे गर्दन को फिर मरोड़ दिया.

 गुलाब ज़ख़्मों के महकें न क्यों हमारे अब ?
लहू जिगर का सभी,लफ़्ज़ों में निचोड़ दिया.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.02-01-2018






रविवार, 31 दिसंबर 2017

चेहरे की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.

ग़ज़ल
चेहरे की चमक, होटों की मुस्कान ले गया.
जीने के मेरे सारे ,वो अरमान ले गया .

सिगरिट, शराब, अश्क, तन्हाई, व बेकली,
किन रास्तों पे मेरा, महरबान ले गया.

अब लोग पूछते हैं, बताओ तो कौन था ?
जो जिस्म छोड़कर, के मेरी जान ले गया.

अब मेज़बां के पास, तो कुछ भी बचा नहीं,
दिल की तमाम हसरतें, महमान ले गया.

हम गुमशुदा हैं ख़ुद से,ही ख़ुद की तलाश है,
अपने वो साथ मेरी भी, पहिचान ले गया.

उसने तो साथ छोड़ दिया, बीच धार में,
साहिल तलक मुझे, मेरा तूफान ले गया.

अँधों के शहर आइना था, बेचना गुनाह,
ये शौक ही तो हम को, बियाबान ले गया.

क्या-क्या हुए हैं हादसे, हम से न पूछिए,
घर को ही लूट घर का,वो दरबान ले गया.
डॉ. सुभाष भदौरिया

डॉ.सुभाष भदौरिया गुजरात ता.31-12-2017.


शनिवार, 30 दिसंबर 2017

घर मेरे उसने जो आना चाहा.

ग़ज़ल

घर मेरे उसने जो आना चाहा.
रास्ता सबने भुलाना चाहा.

और भी सर पे चढ़ गये अपने,
हमने उनको जो मनाना चाहा

ऐब गिनवाके मेरे मुहसिन ने,
दूर जाने का बहाना चाहा.

तोड़ने का रहा जुनूं उसको,
हमने नाता तो निभाना चाहा.

एक तेरी थी तमन्ना हमको,
कब भला हमने ख़ज़ाना चाहा ?

हम बियांबा में भटकते अब भी,
तेरी आँखों में ठिकाना चाहा.

चाह महलों की कहाँ थी हमको,
बस तेरे दिल में समाना चाहा.

हम पहाड़ों से डटे हैं अब भी,
आँधियों ने तो गिराना चाहा.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता. 30-12-2017



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

हाथ में जब भी जाम लेते हैं.

ग़ज़ल

हाथ में जब भी जाम लेते हैं.
बेवफ़ाओं का नाम लेते हैं.

हमसे रखते हैं फ़ासले अक्सर,
सबका झुक झुक सलाम लेते है.

तुझको रुस्वा नहीं होने देंगे,
सब गुनाह अपने नाम लेते हैं.

फूल से ख़ार ही लगे बेहतर,
बढ़ के दामन को थाम लेते हैं.

दिल लगाने का शौक है जिनको
आँसुओं का इनाम लेते हैं.

डॉ. सुभाष भदौरिया गुजरात ता.29-12-2017